णिद्धं मधुरं हिदयंगमं च पल्हादणिज्ज पत्थं च ।
चत्तारि जणा धम्मं कहंति णिच्चं विचित्तकहा॥658॥
मधुर, कर्णप्रिय, हृदय प्रवेशी हितकारी एवं सुखकार ।
नाना कथा कथन में जो हैं कुशल कहें परिचारक चार॥658॥
अन्वयार्थ : और चार मुनि धर्मकथा कहने के अधिकार में प्रवर्ते हैं । कैसे प्रवर्ते - यह कहते हैं । भोजनकथा, स्त्रीकथा, राजकथा, देशकथा, राग की उत्कृष्टता से हास्य से मिले अप्रशस्त वचन का प्रयोग वह कंदर्पकथा, धनोपार्जन करने संबंधी अर्थकथा, नटों की कथा, नर्तकियों की कथा - इत्यादि अध्यात्म/आत्मानुभव की विराधना करनेवाली विकथायें हैं । इन्हें त्यागकर धीर, वीर चार मुनि क्षपक को अनेक प्रकार की कथा कहते हैं । वह कैसे कहते हैं - जो कहते हैं, वह अस्खलित/चूके बिना कहते हैं, 'अशुद्ध शब्द का उच्चारण वह शब्दस्खलन है, विपरीत अर्थ का निरूपण वह अर्थस्खलन है ।' सो जो भी कथा कहें, वह शब्द और अर्थ की विपरीततारहित कहें और जो कहें वह दो-तीन बार नहीं कहें ।
और प्रत्यक्ष अनुमानादि से जिसमें बाधा नहीं आये - ऐसी कहें । अति उच्च-स्वर/बहुत जोर से नहीं कहें, अति विलम्ब/अटक-अटककर नहीं कहें, अति मंद/बहुत धीमे स्वर में भी न कहें, कर्ण में मनोहर लगे - ऐसे कहें । मिथ्यात्वसहित नहीं कहें, अर्थरहित भी नहीं कहें, अर्थसहित हो वही कहें, अपुनरुक्त कहें, कहा हुआ भी बारम्बार नहीं कहें, स्नेहरूप कहें, मिष्ट कहें, हृदय में प्रवेश कर जाये - ऐसा कहें, सुख देनेवाला हो, वह कहें और परिपाककाल में पथ्यरूप हो - ऐसा कहें । इसप्रकार नित्य ही अनेक प्रकार की धर्मकथा कहें ।

  सदासुखदासजी