आक्खेवणी य संवेगणी य णिव्वेयणी य खवयस्स ।
पावोग्गा होंति कहा ण कहा विक्खेवणी जोग्गा॥660॥
आक्षेपणी तथा संवेजनि निर्वेजनी कथा जानो ।
कहने सुनने योग्य किन्तु विक्षेपणी है अयोग्य मानो॥660॥
अन्वयार्थ : आक्षेपिणी कथा, संवेजनी कथा, निर्वेदिनी कथा - ये तीन कथायें क्षपक को सुनने योग्य हैं और विक्षेपिणी कथा समाधिमरण के अवसर में श्रवण करने योग्य नहीं है ।

  सदासुखदासजी