अन्वयार्थ : - जिसमें मतिज्ञानादि का तथा सामायिकादि चारित्र का वर्णन किया हो, वह जिसमें मतिज्ञानादि का तथा सामायिकादि चारित्र का वर्णन किया हो, वह [[आक्षेपिणी कथा]] है ।
- जिसमें स्वमत-परमत के आश्रय से वस्तु का निर्णय किया हो, वह [[विक्षेपिणी कथा]] है । वस्तु सर्वथा नित्य ही है, सर्वथा क्षणिक ही है, एक ही है, अनेक ही है अथवा सत् ही है, असत् ही है तथा विज्ञानमात्र ही है या शून्य ही है - इत्यादि परसमय को पूर्वपक्ष करके और प्रत्यक्ष अनुमान, आगम इनसे सर्वथैकांतपक्ष में दोष-विरोध दिखाकर कथंचित् नित्य, कथंचित् अनित्य, कथंचिदेक, कथंचिदनेक, कथंचित्सत्' इत्यादि अनेकांतरूप स्वसमय की प्ररूपणा जिसमें हो, वह विक्षेपिणी कथा है ।
- ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य, भावना इत्यादि से उत्पन्न शक्ति की संपदा का निरूपण जिसमें हो, वह [[संवेजनी कथा]] है ।
- संसार, देह, भोगों से विरक्तता करानेवाली [[निर्वेदिनी कथा]] है । संसार-परिभ्रमण में जन्मना और मरना - ऐसे त्रस-स्थावर योनियों में जन्म-मरण करते हुए अनंतानंत काल व्यतीत हो गया । शरीर महा अशुचि, रसादिक सप्तधातुमय मल-मूत्रादि से भरा हुआ, माता के रुधिर, पिता के वीर्य से उत्पन्न, महादुर्गन्धमय, अशुचि आहार से बडा हुआ, अशुचि स्थान से निकला, महामलिन, क्षुधा-तृषादि महाव्याधि से संयुक्त, रोगों का स्थान, पोषते-पोषते भी नष्ट हो जाता है, महाकृतघ्न - ऐसा शरीर ज्ञानियों के राग करने योग्य नहीं है । भोग तृष्णा के बढाने वाले हैं, दुर्गति को प्राप्त करानेवाले, अतृप्ति के कारण, महादु:खरूप इनमें राग करना नरक-तिर्यंच गतियों में परिभ्रमण का कारण है, इसलिए आत्महित के इच्छुकों को भोगों का त्याग करके परम वीतरागता को प्राप्त होना श्रेष्ठ है । ऐसा संसार, देह, भोगों का सत्यार्थ स्वरूप दिखाकर आत्मा को परम वीतरागरूप करनेवाली निर्वेदिनी कथा है ।
इसलिए समाधिमरण के अवसर पर विक्षेपिणी कथा बिना तीन कथा करना ।