संवेयणी पुण कहा णाणचरित्तं तववीरिय इह्निगदा ।
णिव्वेयणी पुण कहा सरीरभोगे भवोघे ये॥662॥
ज्ञान-चरित-तप-वीर्य शक्ति बतलाती संवेजनी कथा ।
भव-तन-भोगों से विरक्ति उपजाती निर्वेजनी कथा॥662॥
अन्वयार्थ : इसलिए समाधिमरण के अवसर पर विक्षेपिणी कथा बिना तीन कथा करना ।

  सदासुखदासजी