
आगममाहप्पगओ विकहा विक्खेवणी अपाउग्गा ।
अब्भुज्जदम्मि मरणे तस्स वि एदं अणायदणं॥664॥
बहुश्रुत क्षपक हेतु भी जानो विक्षेपणी कथा नहिं योग्य ।
मरण समय में है अनायतन, रत्नत्रय आराधन योग्य॥664॥
अन्वयार्थ : आगम के माहात्म्य को प्राप्त ऐसा जो बहुश्रुती साधु उनके मरण निकट आने पर विक्षेपिणी कथा अत्यंत अयुक्त है; क्योंकि विक्षेपिणी कथा रत्नत्रय के धारक का अनायतन है, मरण समय में आधार योग्य नहीं है ।
सदासुखदासजी