अब्भुज्जदंमि मरणे संथारत्थस्स चरमवेलाए ।
तिविहं पि कहंति कहं तिदंडपरिमोडया तम्हा॥665॥
संस्तर स्थित मुनि का मरण निकट हो जब त्रय कथा कहे ।
नष्ट करे जो अशुभ दण्डत्रय1 विक्षेपणी अनायतन है॥665॥
अन्वयार्थ : मरण निकट आने पर संस्तर में रहनेवाले क्षपक को अंत समय में संवेजिनी, निर्वेदिनी और आक्षेपिणी - ये तीन प्रकार की कथायें अशुभ मन, वचन, काय से छुडाने वाली कही हैं ।

  सदासुखदासजी