जुत्तस्स तवधुराए अब्भुज्जदमरणवेणुसीसंमि ।
तह ते कहेंति धीरा जह सो आराहओ होदि॥666॥
मृत्यु-बाँस के अग्रभाग पर तपोभार ले खड़े हुए
मुनि से एेसी कथा कहें, जो रत्नत्रय आराधक हो॥666॥
अन्वयार्थ : समीप में जो मरणरूप बाँस उसके मस्तक में तप के भार से युक्त जो क्षपक, उन्हें निर्यापक चार मुनि महा धीर-वीर ऐसे कथा कहते हैं, जैसे उसे श्रवण करते ही आराधना में लीन हो जाये ।

  सदासुखदासजी