
चत्तारि जणा भत्तं उवकप्पेंति अगिलाए पाओग्गं ।
छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा॥667॥
ग्लानि रहित हो दोष रहित भोजन लाते परिचारक चार ।
माया रहित लब्धि सम्पन्न गणी, मुनि हेतु इष्ट आहार॥667॥
अन्वयार्थ : लब्धि से सहित और मायाचार रहित चार मुनि ग्लानिरहित क्षपक को इष्ट तथा क्षपक के योग्य उद्गमादिक दोष रहित भोजन की कल्पना2 करते हैं ।
सदासुखदासजी