चत्तारि जणा पाणयमुवकप्पंति अगिलाए पाओग्गं ।
छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा॥668॥
ग्लानि रहित हो दोष रहित पानक लाते परिचारक चार ।
माया रहित लब्धि सम्पन्न गणी, मुनि हेतु पेय-आहार॥668॥
अन्वयार्थ : लब्धि से संयुक्त, मायाचाररहित ऐसे चार मुनि क्षपक के इष्ट उद्गमादि दोष रहित और योग्य पानक/पीने योग्य उसकी ग्लानिरहित उपकल्पना2 करते हैं ।

  सदासुखदासजी