
चत्तारि जणा रक्खंति दवियमुवकप्पियं तयं तेहिं ।
अगिलाए अप्पमत्ता खवयस्स समाधिमिच्छंति॥669॥
लाये हुए द्रव्य की रक्षा करते हैं परिचारक चार ।
ग्लानि और प्रमाद रहित हो क्षपक-समाधि की वांछा॥669॥
अन्वयार्थ : चार मुनियों से उपकल्पित किया जो द्रव्य/आहार-पान, उसकी चार मुनि प्रमादरहित होकर ग्लानिरहित रक्षा करते हैं और क्षपक के समाधिमरण की इच्छा करते हैं ।
सदासुखदासजी