
काइयमादी सव्वं चत्तारि पदिट्ठवंति खवयस्स ।
पडिलेहंति य उवधीकाले सेज्जुवधिसंथारं॥670॥
करें क्षपक का मल मूत्रादिक क्षेपण प्रासूक भू पर चार1 ।
करें वसति-उपकरण और संस्तर प्रतिलेखन प्रातः सायं॥670॥
अन्वयार्थ : चार मुनि क्षपक का कायिकादि सर्व मल-मूत्र को प्रासुक भूमि में क्षेपण/डालते हैं और प्रभातकाल में तथा दिन अस्त होने के समय में वसतिका, उपकरण तथा संस्तर का शोधन करते हैं ।
सदासुखदासजी