खवयस्स घरदुवारं सारक्खंति जणा चत्तारि ।
चत्तारि समोसरणदुवारं रक्खंति जदणाए॥671॥
रक्षा करें क्षपक के घट-द्वारे की भी परिचारक चार ।
धर्म-सभा दरवाजे की रक्षा करते परिचारक चार॥671॥
अन्वयार्थ : चार मुनि क्षपक की वसतिका के द्वार की रक्षा करते हैं । असंयमी जन या दुर्बुद्धिजन क्षपक के परिणामों में क्षोभ करने के लिये क्षपक के निकट न जा सकें, बाहर से ही महान मिष्ट वचन से धर्मोपदेशादि से स्तम्भन/बाहर ही रोक लें और उनके शांत परिणाम कर दें तथा आराधनामरण में भक्ति उत्पन्न कर दें, ऐसे रहते हैं ।
चार मुनि सभा के द्वार की यत्न से रक्षा करते हैं, सभास्थान में तिष्ठते हैं, आराधना मरण सुनकर आये हुए, अनेक लोगों से धर्मकथा करते हैं ।

  सदासुखदासजी