
जिदणिद्दा तल्लिच्छा रादौ जग्गंति तह य चत्तारि ।
चत्तारि गवेसंति खु खेत्ते देसप्पवत्तीओ॥672॥
निद्रा जय इच्छुक2 अरु निद्राजयी जागते हैं यति चार ।
और देश की परिस्थिति की करें समीक्षा भी यति चार॥672॥
अन्वयार्थ : जीती है निद्रा जिनने और निद्रा जीतने के इच्छुक - ऐसे चार मुनि रात्रि में जागृत रहते हैं और चार मुनि क्षेत्र में तथा उस देश में क्षेम-कुशलरूप प्रवृत्ति की परीक्षा करते हैं, अवलोकन करते हैं कि आराधना में विघ्न न आये ।
सदासुखदासजी