
वाहिं असद्दवडियं कहंति चउरो चदुव्विधकहाओ ।
ससमयपरसमयविदू परिसाए सा समोसदाए खु॥673॥
स्व-पर समय के ज्ञाता मुनिवर कहें क्षपक गृह के बाहर ।
मन्द स्वरों में चार कथायें धर्म रसिक श्रोताओं को॥673॥
अन्वयार्थ : और क्षपक के आवास के बाहर जिस स्थान से क्षपक के कर्ण में शब्द/आवाज नहीं आये, इतने दूर स्थान में तिष्ठते हैं तथा स्वमत-परमत के जाननेवाले सभा में आनेवाले अनेक लोग उन्हें आक्षेपिणी, विक्षेपिणी, संवेजनी, निर्वेजनी - ये चार प्रकार की धर्मकथा कहते हैं । उन्हें क्षपक के समीप नहीं पहुँचने देते; क्योंकि कषायसहित अनेक जीव क्षपक के निकट अयोग्य वचन, अयोग्य कथा/वृथा बकवाद करके क्षपक के परिणाम मरणकाल में बिगाड दें, इसलिए स्वमत-परमत के जाननेवाले वचन-कला सहित चार ज्ञानी मुनि अनेक आनेवाले मनुष्यों को धर्मकथा कहकर संतुष्ट करते हैं ।
सदासुखदासजी