एवं महाणुभावा पग्गाहिदाए समाधिजदणाए ।
तं णिज्जवंति खवयं अडयालीसं हि णिज्जवया॥675॥
इसप्रकार निर्यापक अड़तालीस अति महिमाशाली ।
करते रहें प्रयत्न क्षपक की जिससे हो उत्कृष्ट समाधि॥675॥
अन्वयार्थ : ऐसे चार मुनि तो क्षपक को उठाना, बैठाना, सुलाना, हाथ-पैरादि समेटना, पसारना, जैसे संयम में दोष न लगे, वैसे शरीर की सेवा के अधिकारी/तत्पर रहते हैं । यद्यपि अपना सामर्थ्य हो, तब तक स्वयं ही अपने आप बैठना, उठना, टहलना, सर्व कार्य करते हैं, अन्य से नहीं कराते हैं, तथापि यदि अशक्त हो जायें तो अन्य चार मुनियों को शरीर की टहल करने का अधिकार है ।
चार मुनियों को धर्मश्रवण कराने का अधिकार है । चार मुनि आचारांग में जैसे भगवान ने आज्ञा की है, वैसे क्षपक के भोजन के अधिकारी हैं । चार मुनि पान के अधिकारी हैं । चार मुनि रक्षा के अधिकारी हैं । चार मुनि शरीर के मल दूर करने के अधिकारी हैं । चार मुनि क्षपक की वसतिका के द्वार के अधिकारी हैं, कारण कि अनेक लोग क्षपक के परिणामों में क्षोभ न कर सकें । चार मुनि, अनेक लोग आराधना मरण सुनकर आये, उन्हें संबोधने में सावधान होकर सभा में तिष्ठते हैं । चार मुनि रात्रि में जागृत रहते हैं । चार मुनि देश की प्रवृत्ति देखने के अधिकारी हैं । चार मुनि बाहर ही आने-जाने वालों से कथा कहने के अधिकारी हैं । चार मुनि वाद (करने) के अधिकारी हैं । ऐसा महान है प्रभाव जिनका ऐसे अडतालीस निर्यापक मुनि, वे यत्नपूर्वक ग्रहण की जो समाधि उसके द्वारा क्षपक को संसार से पार कर देते हैं । इतने गुण सहित अडतालीस निर्यापक का वर्णन किया । उनका नियम ही है - ऐसा नहीं जानना । भरत-ऐरावत क्षेत्र में काल की विचित्रता से जैसे अवसर में जैसी विधि मिल जाये, जितने गुणों के धारक हों और जितने हों, उतने ही ग्रहण कर लेना । पंचम काल में सच्चे श्रद्धानी सुन्दर आचार के धारी धर्मानुरागियों का संग मिल जाये, वही अतिश्रेष्ठ है । इस विषम कलिकाल में धर्मानुरागी श्रद्धानी अतिदुर्लभ हैं । इसलिए दो-चार जितने मिल जायें, उतने ही धर्मानुरागियों का संग करके धर्मध्यानसहित ममतारहित परमात्मस्वरूप में मन लगाकर समाधिमरण करना श्रेष्ठ है ।

  सदासुखदासजी