एवं चदुरो चदुरो परिहावेदव्वगा य जदणाए ।
कालम्मि संकिलिट्ठंमि जाव चत्तारि साधेंति॥677॥
चार-चार निर्यापक कम होते हैं देश काल अनुसार ।
अनुक्रम से कम करते-करते निर्यापक होते हैं चार॥677॥
अन्वयार्थ : भरत-ऐरावत क्षेत्रों में जो काल हो, उस काल में उस काल के अनुसार जघन्य गुणों के धारक जिस अवसर माफिक जिनमें गुणों की कमी नहीं - ऐसे चवालीस ही निर्यापक हों तथा चालीस, छत्तीस, बत्तीस - ऐसे या संक्लेशरूप काल में घटते-घटते चार मुनीश्वरों तक समाधिमरण करानेवाले निर्यापक मुनि होते हैं । चतुर्थ काल के समान द्वादशांग के धारक तथा आचारवानादि अनेक गुणों के धारक कहाँ से प्राप्त हों? इसलिए जिनके श्रद्धान-ज्ञान दृढ हों, पापाचार से भयभीत हों, धर्मानुरागी हों, उन निर्यापक को ग्रहण करना । उत्कृष्ट तो अडतालीस कहे, मध्यम चवालीस से लेकर चार मुनीश्वर कहे ।

  सदासुखदासजी