
णिज्जावया य दोण्णि वि होंति जहण्णेण काल-संसयणा ।
एक्को णिज्जावयओ ण होइ कइया वि जिणसुत्ते॥678॥
काल खराब अधिक होने पर दो ही होते निर्यापक ।
किन्तु जिनागम में न कहा है कभी एक ही निर्यापक॥678॥
अन्वयार्थ : काल के आश्रय/प्रभाव से जघन्य दो ही निर्यापक होते हैं । जिनसूत्र में एक निर्यापक कदापि नहीं होते ।
सदासुखदासजी