+ इसी का पाठान्तर कहते हैं - -
कालाणुसारिणो दो भरहेरावदभवा जहण्णेण ।
णिज्जावया य जइणो घेतव्वा गुणमहल्ला दु ॥679॥
कालाणुसापरणाि दाि भरहरिावदभवा जहण्णणि ।
ेणज्जावया य जइणाि घतिव्वा गुणमहल्ला दु ॥679॥
अन्वयार्थ : काल के अनुसार भरत-ऐरावत में उत्पन्न दो ही निर्यापक मुनि महान गुणों के धारक जघन्य से/कम से कम हों तो ग्रहण करने योग्य हैं । एक निर्यापक हो तो क्या दोष आता है? यह कहते हैं -

  सदासुखदासजी