
एगो जइ णिज्जवओ अप्पा चत्तो परोपवयणं च ।
वसणमसमाधिमरणं उड्डाहो दुग्गदी चावि॥680॥
यदि एक निर्यापक हो तो निज-पर अरु प्रवचन का त्याग ।
दुःख होता, असमाधि मरण, दुर्गति अरु धर्म-दोष होता॥680॥
अन्वयार्थ : यदि एक निर्यापक, क्षपक की वैयावृत्त्य करनेवाला हो तो अपना त्याग हो जायेगा, नाश होगा तथा पर/क्षपक उसका नाश होगा, धर्म का नाश होगा और व्यसन/दु:ख, असमाधिमरण होगा, धर्म का अपयश होगा और दुर्गति होगी । इसलिए एक मुनि समाधिमरण के समय वैयावृत्त्य करने में ग्रहण नहीं किया है ।
सदासुखदासजी