
खवगपडिजग्गणाए भिक्खग्गहणादिमकुणमाणेण ।
अप्पा चत्तो तव्विवरीदो खवगो हवदि चत्तो॥681॥
क्षपक कार्यरत यति न कर सके भिक्षा ग्रहण आदि निजकार्य ।
आत्म त्याग हो अतः, अन्यथा वर्तन में हो मुनि1 का त्याग॥681॥
अन्वयार्थ : यदि एक निर्यापक हो तो क्षपक का कार्य वैयावृत्त्य टहल में उद्यमी होने पर, आप स्वयं भिक्षा ग्रहण नहीं करने से, निद्रा नहीं लेने से, कायमल का निवारण नहीं करने से निर्यापक को बहुत पीडा होती है; क्योंकि संस्तर में तिष्ठते/पडे साधु की सेवा करते रहेंगे, तब स्वयं के भोजन के लिये जाना, निद्रा लेना तथा मलमोचन/शौच क्रिया करना इत्यादि कार्य नहीं कर सकते, तब स्वयं/निर्यापक के त्याग नाश/पतन हो ही जाता है और यदि क्षपक को अकेला छोडकर भिक्षा को जायें या निद्रा लेवें या शौचक्रिया को जायें तो क्षपक का नाश होता है । शरीर क्षीण है, मरण के सन्मुख क्षपक की वैयावृत्त्य बिना उनका त्याग ही हो जाता है ।
सदासुखदासजी