
खवयस्स अप्पणो वा चाए चत्तो हु होइ जइधम्मो ।
णाणस्स य उच्छेदो पवयणचाओ कओ होदि॥682॥
निज या यति का त्याग हुआ तो होता यतिधर्म भी त्याग ।
ज्ञान-त्याग भी होता जिससे हो जाता प्रवचन का त्याग॥682॥
अन्वयार्थ : कोई यह कहे, क्षपक की रक्षा के लिये अपना त्याग करना तथा आत्मरक्षा के लिये क्षपक का त्याग करने में क्या दोष है?
क्षपक का त्याग होने से या अपना/निर्यापक का त्याग होने से, यति धर्म का ही त्याग हो जायेगा; क्योंकि देह के आधार से मुनिधर्म को पालते हैं और अकाल में संक्लेश से देह त्यागा तो देह के आधार से धर्म था, उसका भी त्याग हो गया तथा सामने वाले के धर्म का विच्छेद हो गया और क्षपक के साथ ही निर्यापक भी मर जाये । तब ज्ञान का उपदेश कौन करेगा ? और यदि ज्ञान का उपदेश नहीं रहा तो प्रवचन/आगम का नाश होता है । और क्षपक को त्यागा तो क्षपक का मरण बिगड जाने से दुर्गति होगी तथा धर्म का नाश होगा । इसलिए दोनों के त्याग में बडा दोष है ।
सदासुखदासजी