
चायम्मि कीरमाणे वसणं खवयस्स अप्पणो चावि ।
खवयस्स अप्पणो वा चायम्मि हवेज्ज असमाधि॥683॥
त्याग क्षपक का होने से दुःख बहुत क्षपक को होता है ।
निज का हो या त्याग क्षपक का असमाधिमरण दोनों का हो॥683॥
अन्वयार्थ : यदि निर्यापक क्षपक को छोडकर आहार के लिये जायें या निद्रा लेवें तो क्षपक को दूसरे के बिना दु:ख होगा और आहारादि नहीं करते तो आप/निर्यापक को दु:ख होगा या नाश होगा और यदि क्षपक का त्याग करें तो क्षपक को धर्मोपदेश के बिना असमाधिमरण होगा और स्वयं भोजनादि नहीं करें तो भोजन बिना संक्लेश से स्वयं का असमाधिमरण होगा ।
सदासुखदासजी