
असमाधिणा व कालं करिज्ज सो सुण्णगम्मि णिज्जवगे ।
गच्छेज्ज तओ खवओ दुग्गदिमसमाधिमरणेण॥685॥
यदि निर्यापक निकट न हो तो यति असमाधि मरण करे ।
करने से असमाधिमरण वह दुर्गति में भी गमन करे॥685॥
अन्वयार्थ : निर्यापकरहित मुनि को कदाचित् वेदनादि के कारण परिणाम बिगड जायें, तब कौन स्थितिकरण करेगा? तब क्षपक की असमाधिमरण से दुर्गति होगी । इसलिए एक निर्यापक का निषेध है तथा लौकिक जनों में भी देखते हैं कि बीमारी सहित व्यक्ति की सेवाशुश्रूषा एक व्यक्ति से नहीं बन सकती, अत: दो निर्यापक से कम नहीं होते ।
सदासुखदासजी