सल्लेहणं सुणित्ता जुत्ताचारेण णिज्जवेज्जंतं ।
सव्वेहिं वि गंतव्वं जदीहिं इदरत्थ भयणिज्जं॥686॥
युक्ताचार्य कराते हैं सल्लेखन - यह सुन सब यतिगण ।
जायें वहाँ, अन्यथा यदि चाहें तो जायें, न जायें॥686॥
अन्वयार्थ : योग्य आचरण के धारकों द्वारा कराई गई सल्लेखना के धारक क्षपक के पास जाना उचित ही है । आराधना के धारकों का भक्तिपूर्वक दर्शन आत्मा की आराधना का कारण है ।

  सदासुखदासजी