
सल्लेहणाए मूलं जो वच्चइ तिव्वभत्तिराएण ।
भोत्तूण य देवसुहं सो पावदि उत्तमं ठाणं॥687॥
जो यति तीव्र भक्ति से जाते हैं सल्लेखन-स्थल पर ।
स्वर्ग सुखों को भोगें फिर वे उत्तम शिव सुख प्राप्त करें॥687॥
अन्वयार्थ : जो साधु या श्रावक तीव्र भक्ति के राग से सल्लेखना करनेवाले के चरणारविंदों के निकट गमन करते हैं/रहते हैं, वे देवों का सुख भोगकर उत्तम स्थान जो निर्वाण उसे प्राप्त करते हैं ।
सदासुखदासजी