एगम्मि भवग्गहणे समाधिमरणेण जो मदो जीवो ।
ण हु सो हिंडदि बहुसो सत्तठ्ठभवे पमोत्तूण॥688॥
एक बार भी करे समाधि पूर्वक मरण यदि जो जीव ।
सात-आठ भव से ज्यादा वह परिभ्रमण न करे कभी॥688॥
अन्वयार्थ : जो जीव एक भव में समाधिमरणपूर्वक मरण करता है, वह जीव सात-आठ भव को छोडकर अधिक संसार में परिभ्रमण नहीं करता ।

  सदासुखदासजी