
सोदूण उत्तमट्ठस्स साधणं तिव्वभत्तिसंजुत्तो ।
जदि णोवयादि का उत्तमट्ठमरणम्मि से भत्ती॥689॥
उत्तमार्थ साधन करते मुनि - यह सुनकर उमड़े न भक्ति ।
जाए नहीं जो तो उसकी क्या मरण-समाधि में भक्ति?॥689॥
अन्वयार्थ : उत्तमार्थ का साधन जो समाधिमरण, उसे श्रवण करके भी तीव्र भक्तिसंयुक्त होता हुआ समाधिमरण करनेवालों के निकट नहीं जाता, उसे उत्तमार्थ मरण में काहे की भक्ति ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।
सदासुखदासजी