
जस्स पुण उत्तमट्ठमरणम्मि भत्ती ण विज्जदे तस्स ।
किह उत्तमट्ठमरणं संपज्जदि मरणकालम्मि॥690॥
जिसके उर में नहीं उमड़ती मरण समाधि की भक्ति ।
मरण समय में हो न सके तो मरण-समाधि भी उसकी॥690॥
अन्वयार्थ : जिसे उत्तमार्थ मरण में भक्ति नहीं होती, उसे मरणसमय में उत्तमार्थमरण कैसे प्राप्त होता होगा? नहीं प्राप्त होता ।
सदासुखदासजी