
सद्दवदीणं पासं अल्लियदु असंवुडाण दादव्वं ।
तेसिं असंवुडगिराहिं होज्ज खवयस्स असमाधी॥691॥
वचन-समिति से रहित जनों को क्षपक समीप न जाने दें ।
उनके वचन-असंयत सुनकर असमाधि यति की होेवे॥691॥
अन्वयार्थ : कलकलाट शब्द करनेवाले, झूठ वचनरूप द्रुम/दम्भ करके असंवररूप वृथा बकवाद करनेवालों को क्षपक के समीप जाने देना योग्य नहीं है । उनके संवररहित वचन से क्षपक की सावधानी बिगड जाती है ।
सदासुखदासजी