
भत्तादीणं तत्ती गीदत्थेहिं वि ण तत्थ कादव्वा ।
आलोयण वि हु पसत्थमेव कादव्विया तत्थ॥692॥
आगमज्ञ यति भी न वहाँ पर भोजनादि की कथा करें ।
आलोचन सम्बन्धी चर्चा भी यति से हो दूर करें॥692॥
अन्वयार्थ : गृहीतार्थ ऐसे ज्ञानी मुनि उनको भी क्षपक के समीप भाग में प्रसंग पाकर भी भोजनादि की कथा करना योग्य नहीं है । क्षपक के समीप आलोचना भी प्रशस्त ही करने योग्य है ।
सदासुखदासजी