तेल्लकसायादीहिं य बहुसो गंडूसया दु घेतव्वा ।
जिब्भाकण्णाण बलं होहिदि तुण्डं च से विसदं॥694॥
तल्लिकसायादीहिं य बहुसाि गंडूसया दु घतिव्वा ।
ेजब्भाकण्णाण बलं हािेहेद तुण्डं च सि ेवसदं॥694॥
अन्वयार्थ : और जब आहार त्यागने का अवसर आ जाये, तब क्षपक को तैलीय2 तथा कषायले द्रव्यों का क्वाथ/काढा करके अनेक बार गँडूषा अर्थात् कुल्ला कराना योग्य है । तेल के कुल्लों से तथा कषायले द्रव्यों/पदार्थ के कुल्लों से क्षपक का जिह्वा-बल नहीं घटता, वचन की शक्ति नहीं घटती तथा कर्ण की सुनने की शक्ति नहीं घटती, मुख की निर्मलता बनी रहती है, तब धर्मश्रवण में, धर्मकथा में शक्ति नहीं घटती । इसलिए तैलीय-कषायले पदार्थ के कुल्ले कराना ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में निर्यापक नामक सत्ताईसवाँ अधिकार ब्यालीस गाथाओं में पूर्ण किया ।
1. तलि और कषायलि दिाथाब कि काढ़ि सि 2. जब चारों प्रकार के आहार का त्याग किया है तो तैल आदि के कुल्ले कर सकते हैं क्या ? यदि हाँ तो लायेंगे कहाँ से ? इसका अर्थ यह है कि अंतिम पेय आहार ले चुकने के बाद तैल या कषायले पदार्थ के काढे के कुल्ले करवाना चाहिए । इसका अर्थ यह है कि अंतिम पेय आहार ले चुकने के बाद तैल या कषायले पदार्थ के काढे के कुल्ले करवाना चाहिए ।

  सदासुखदासजी