पं-सदासुखदासजी
आसादित्ता कोई तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि॥698॥
स्वादमात्र ले - मैं मरणोन्मुख मुझको है इनसे क्या लाभ?
यह विचार कर हो विरक्त वह प्रकटाये वैराग्य अपार॥698॥
सदासुखदासजी