पं-सदासुखदासजी
देसं भोच्चा हा हा तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि॥699॥
थोड़ा खाकर - मैं मरणोन्मुख मुझको है इनसे क्या लाभ?
यह विचार कर हो विरक्त वह प्रकटाये वैराग्य अपार॥699॥
सदासुखदासजी