
सव्वं भोच्चा धिद्धी तीरं पत्तस्सिमेहिं किं मेत्ति ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो होदि ॥700॥
कोई सब आहार भोगकर मुझको बारम्बार धिक्कार ।
मुझे लाभ क्या - यह विचार कर हो विरक्त वैराग्य अपार॥700॥
अन्वयार्थ : कोई मुनि सकल आहार को लेकर विचार करते हैं - धिक्कार होओ! आयु के अन्त को प्राप्त हुआ मैं, मुझे इन आहारों से क्या साध्य है?
यहाँ इतना विशेष चिंतवन करते हैं कि हे अात्मन्! संसारपरिभ्रमण करते हुए तूने इतना आहार ग्रहण किया कि एक-एक पर्याय संबंधी ग्रहण करें तो पूरे लोक में नहीं समायेगा और इतना जल पिया कि अनंत समुद्र भर जायें । अब अन्त समय में आहार-पान का लोलुपी होकर अल्प आहार-पान से कैसे तृप्ति होगी? अब इस लोलुपता को त्यागकर ध्यानरूप अमृत से वेदना बुझाना योग्य है । अनन्त काल में अनंत बार इन्द्रियों के विषय पाये तो भी दाह नहीं मिटी । देवों के भोग और भोगभूमि के भोग निरंतर असंख्यातकालपर्यंत भोगे, उनसे भी चाहरूप दाह नहीं मिटी,तो मनुष्यजन्म संबंधी किंचित् काल भोगने में आने योग्य, इनसे चाह कैसे मिटेगी ?
कैसी है आहार की तृष्णा? ज्यों-ज्यों आहार ग्रहण करते हैं, त्यों-त्यों दाह बढती है । हे आत्मन्! अनंतानंत काल तक एकेन्द्रिय में रसना इन्द्रिय नहीं पाई तो खट्टे-मीठे रस का आस्वादन जिह्वा बिना किससे करेंगे? और सदाकाल क्षुधा-तृषा से पीडित ही रहा । बेइन्द्रियादि तिर्यंच योनि में कभी पेटभर भोजन भी नहीं मिला । सदा रात-दिन भोजन के लिए धरती सूँघता फिरा और नरकधरा में भोजन ही नहीं मिला । इसलिए अनंतानंत काल क्षुधातृषा को भोगते हुए व्यतीत हुआ । अब अल्प भोजन से कैसे तृप्ति होगी? अत: आहार की गृद्धता/लंपटता, उससे यह समाधिमरण का अवसर अनंतानंत संसार के दु:खों को छेदनेवाला, उसे बिगाडकर संसार में अनंतानंत कालपर्यंत तीव्र क्षुधा-तृषा की वेदना से संयुक्त दुर्गति के दु:ख ग्रहण करना योग्य नहीं । अनंत काल से कर्म के वशीभूत होकर बहुत वेदना भोगी, अब स्वाधीन होकर समभावों से यदि एक बार भी सहूँगा तो फिर वेदना का पात्र नहीं होऊँगा । इसलिए अब मेरे इस आहार से पूर पडे अर्थात् बस हो । ऐसे वैराग्य को प्राप्त हुआ संसार परिभ्रमण से भयभीत होता है ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में प्रकाशन नामक अट्ठाईसवाँ अधिकार छह गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी