
कोई तमादयित्ता मणुण्णरसवेदणाए संगिवद्धो ।
तं चेवणुबंधेज्ज हु सव्वं देसं च गिद्धीए॥701॥
तत्थ अवाओवायं दंसेदि विसेसदो उवदिसंतो ।
उद्धरिदु मणोसल्लं सुहुमं सण्णिव्ववेमाणो॥702॥
कोई अशन ग्रहण कर उसके मधुर स्वाद में मूर्च्छित हो ।
सब पदार्थ या किसी एक को खाने की इच्छा करता॥701॥
तब संयम का नाश असंयम प्राप्ति दिखाने को आचार्य ।
दें विशेष उपदेश करें निःशल्य और उसका मन शान्त॥702॥
अन्वयार्थ : किन्हीं मुनि की आयु अल्प रह जाये और तीन प्रकार के आहार त्यागने का अवसर आ जाये, तब त्याग कराने के लिये आहार कराते हैं । उनमें कोई मुनि आहार का आस्वादन करके और मनोज्ञ रस का अनुभव करके गृद्धता से मूर्च्छित होकर आस्वादन किये हुए सभी आहार में तथा उसके एकदेश में लंपटता से अति आसक्तता को प्राप्त हो जायें तो आचार्य उन्हें आहार की लंपटता से इन्द्रिय संयम का नाश होना और असंयम भाव का प्रगट होना दिखाते हैं कि हे मुने! भोजन की लंपटता से इन्द्रियसंयम बिगाडते होऔर असंयम को ग्रहण करते हो ।यह तो बडा अनर्थ करते हो । जिह्वा इन्द्रिय का स्वाद क्षणमात्र का है और आयु का अन्त भी आ गया है तो अब रसना इन्द्रिय के विषय में लोलुपी होकर इन्द्रलोक, अहमिन्द्रलोक तथा अनंत सुखरूप निर्वाण का लाभ जिससे प्राप्त हो - ऐसे संयम को बिगाड कर नरक-तिर्यंच गति के सन्मुख होना योग्य नहीं । मरण तो अवश्य होगा ही होगा, किन्तु इस लोक में धर्म की, गुरुकुल की निन्दा होगी और परलोक में दुर्गति के दु:ख प्राप्त होंगे । इसलिए इन्द्रियों की लंपटता त्यागकर संयम में सावधान होओ । ऐसी सूक्ष्म मन की शल्य उखाडने के लिये सम्यक् उपशमभाव को प्राप्त करो ।
सदासुखदासजी