सुच्चा सल्लमणत्थं उद्धरदि असेसमप्पमादेण ।
वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो खवओ॥703॥
सुनकर वे वैराग्य वचन यति करते हैं प्रमाद परित्याग ।
करें शल्य को दूर और संवेग भावना में तत्पर॥703॥
अन्वयार्थ : ऐसे आचार्ये से वैराग्यभावना सुनकर और अनर्थकारी समस्त शल्यों को प्रमादरहित होकर उद्धरति अर्थात् उखाडते हैं । पश्चात् वैराग्य को प्राप्त हुए क्षपक संसार-भोगशरीरों से अत्यंत विरक्त होते हैं ।

  सदासुखदासजी