
अणुपुव्वेण य ठविदे संवट्टेदूण सव्वमाहारं ।
पाणयपरिक्कमेण दु पच्छा भावेदि अप्पाणं॥705॥
पूर्व अशन पर स्थित हो फिर क्षपक करे क्रम-क्रम से त्याग ।
अशन खाद्य अरु स्वाद्य सभी का फिर पानक का करे विचार॥705॥
अन्वयार्थ : आहार में अनुरागवान क्षपक को समाधिमरण कराने के इच्छुक परम दयालु गुरु ऐसा सत्यार्थ उपदेश देकर एक-एक आहार से ममत्व छुडाकर पुरातन आहार की लालसारहित नीरस आहार की भी चाहना नहीं, इसप्रकार आहार से विरक्ति में स्थित करते हैं । बाद में अनुक्रम से सर्व आहार की अभिलाषा को संकुचित करके और पानक/पीने योग्य जलादि में क्षपक को स्थित करते हैं, पश्चात् सभी आहारादि की अभिलाषारहित होकर शुद्ध ज्ञानानंद अविनाशी अखंड ज्ञाता-दृष्टा अपने आत्मा की भावना कराते हैं ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यान के चालीस अधिकारों में आहार की हानि नामक उनतीसवाँ अधिकार पाँच गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी