आणाहवत्तियादीहिं वा वि कादव्वमुदरसोधणयं ।
वेदणमुप्पादेज्ज हु करिसं अच्छंतयं उदरे॥709॥
अनुवासन-औषधि आदिक से करें उदरमल का शोधन ।
क्योंकि उदर में रहा हुआ मल देता है दुःख का वेदन॥709॥
अन्वयार्थ : उदर में रहा मल, वह वेदना उत्पन्न करता है, इसलिए अनुवासनादि1 करके क्षपक का उदरमल निराकरण करने/निकालने योग्य है । अनुवासनादि कोई मलविरेचन करने की विधि है, वह वैद्यादि से जानी जाती है, हम नहीं जानते । जिसका उदरशोधन किया है - ऐसा क्षपक, उनके योग्य निर्यापक गुरु का व्यापार दिखाते हैं -
1अमितगति आचार्य प्रणीत मरणकण्डिका, गाथा 732-733, पृष्ठ 217 जिसको पानक आहार दिया जा
रहा है - ऐसे क्षपक के पेट की विशुद्धि के लिये तथा मल का विरेचन करने के लिए मंद मधुर पानक पिलाना
चाहिए । काँजी में भीगे हुए बिल्व पत्तों से क्षपक के पेट को सेंकना, नमक आदि की बत्ती गुदा-द्वार में लगाना
इत्यादि क्रिया से क्षपक के उदर के मल का शोधन कर लेना चाहिए; क्योंकि यदि उदर का मल न निकाला
जाये तो महान पीडा होती है ।

  सदासुखदासजी