+ क्षपक, उनके योग्य निर्यापक गुरु का व्यापार दिखाते हैं - -
जावज्जीवं सव्वाहारं तिविहं च वोसरिहिदित्ति ।
णिज्जवओ आयरिओ संघस्स णिवेदणं कुज्जा॥710॥
निर्यापक आचार्य संघ से कहें अहो जीवन पर्यन्त ।
करता है अब त्याग क्षपक यह भोजन खाद्य-रु स्वाद्य अशन॥710॥
अन्वयार्थ : अब निर्यापक आचार्य सम्पूर्ण संघ से ऐसा निवेदन करके बताते हैं - भो! सर्व संघ के साधुजनो! अब यह क्षपक यावज्जीव तीन प्रकार के आहार का त्याग करते हैं ।

  सदासुखदासजी