अब्भहिदजादहासो मत्थम्मि कदंजली कदपणामो ।
खामेइ सव्वसंघं संवेगं संजणेमाणो॥717॥
चित् प्रसन्न कर अंजलि मस्तक पर रख क्षपक प्रणाम करे ।
प्रकट करे धर्मानुराग अरु सर्व संघ से क्षमा लहे॥717॥
अन्वयार्थ : उत्पन्न हुआ है चित्त में हर्ष जिनके और की है मस्तक पर अंजुली जिनने और किया है नमस्कार जिनने - ऐसे क्षपक सर्व संघ को धर्मानुराग उत्पन्न कराके क्षमा ग्रहण करावें/ क्षमा माँगते हैं ।

  सदासुखदासजी