
मणवयणकायजोगेहिं पुरा-कदकारिदे अणुमदे वा ।
सव्वे अवराधपदे एस खमावेमि णिस्सल्लो॥718॥
मन-वच-काय योग से एवं कृत-कारित-अनुमोदन से ।
हो निःशल्य मैं क्षमा माँगता किये हुए अपराधों की॥718॥
अन्वयार्थ : मन, वचन, काय से जो दोष मैंने पूर्व में किये हों, कराये हों, करनेवाले को भला जाना हो/अनुमोदना की हो; उन सभी अपराधों से मैं शल्यरहित होकर क्षमा चाहता हँू ।
सदासुखदासजी