
इय खामिय वेरग्गं अणुत्तरं तवसमाधिमारूढो ।
पप्फोडंतो विहरदि बहुभवबाधाकरं कम्मं॥721॥
करके क्षमा क्षपक वैराग्य धरे अरु, तप समाधि में लीन होक
र, भव-भव दुःखदायक सब कमाब को वह करता क्षीण॥721॥
अन्वयार्थ : ऐसे क्षमा ग्रहण करके और सर्वोत्कृष्ट वैराग्य, सर्वोत्कृष्ट तप में सावधानी को प्राप्त हुआ क्षपक, वह बहुत भवों में बाधा करनेवाले कर्म की निर्जरा करता हुआ प्रवर्तता है ।
सदासुखदासजी