
वट्टति अपरिदंता दिवा य रादो य सव्वपरियम्मे ।
पडिचरया गुणहरया कम्मरयं णिज्जरेमाणा॥722॥
करें क्षपक की परिचर्या निर्यापक निशदिन बिना थके ।
सबका संरक्षण करते हैं अतः कर्म निर्जरा करें॥722॥
अन्वयार्थ : गुणों के धारक और कर्मरज की निर्जरा करनेवाले निर्यापकाचार्य, वे क्षपक की रात्रि में, दिन में सर्व परिकर्म/सेवा में खेदरहित हुए निरंतर प्रवर्तते हैं ।
सदासुखदासजी