जं बद्धमसंखेज्जाहिं रयं भवसदसहस्सकोडीहिं ।
सम्मत्तुप्पत्तीए खवेइ तं एयसमयेण॥723॥
शत-सहस्र कोटिक भव में जो असंख्यात बाँधे रज कर्म ।
सम्यग्दर्शन प्रकट करे जो एक समय में करें विनष्ट॥723॥

  सदासुखदासजी