पं-सदासुखदासजी
एयसमएण विधुणदि उवउत्तो बहुभवज्ज्यिं कम्मं ।
अण्णयरम्मि य जोग्गे पच्चक्खाणे विसेसेण॥724॥
बहुभव संचित कर्म खिपाये एक समय में जो तप युक्त ।
आजीवन जो त्याग करे उसको विशेष निर्जरा जिनोक्त॥724॥
सदासुखदासजी