एवं पडिक्कमणाए काओसग्गे य विणयसज्झाए ।
अणुपेहासु य जुत्तो संथारगओ धुणदि कम्मं॥725॥
इसप्रकार प्रतिक्रमण विनय स्वाध्याय तथा तन का उत्सर्ग ।
अनुप्रेक्षा में युक्त संस्तरारूढ़ निर्जरा करे क्षपक॥725॥
अन्वयार्थ : जिन कर्म का असंख्यात कोटि भवों में बंध किया, उन कर्मरजों को सम्यक्त्व की उत्पत्ति से ज्ञानी एक समय में खिरा देता है, निर्जरा कर देता है । अन्य तपों में या चार प्रकार के आहार त्याग में उपयुक्त हुआ क्षपक अनेक भवों में उपार्जित किये कर्म को एक समय में खिरा देता है । ऐसे प्रतिक्रमण में, कायोत्सर्ग में, विनय में, स्वाध्याय में, बारह अनुप्रेक्षा में युक्त जो संस्तर को प्राप्त हुआ क्षपक, वह कर्म की निर्जरा करता है ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में क्षपण नामक बत्तीसवाँ अधिकार छह गाथाओं में पूर्ण हुआ ।

  सदासुखदासजी