+ अब अनुशिष्टि नामक तेतीसवाँ अधिकार सात सौ सत्तर गाथाओं में कहते हैं । उनमें से चार गाथाओं में सामान्य शिक्षा कहते हैं - -
णिज्जवया आयरिया संथारत्थस्स दिंति अणुसिट्ठिं ।
संवेगं णिव्वेगं जणंतयं कण्णजावं से॥726॥
संस्तर पर आरूढ़ क्षपक को शिक्षा देते हैं आचार्य ।
भय एवं वैराग्य जनक यह शिक्षा शास्त्रों के अनुसार॥726॥
अन्वयार्थ : निर्यापक आचार्य क्षपक को जिनसूत्र की आज्ञाप्रमाण अनुशिष्टि/शिक्षा देते हैं और संसार से भय एवं वैराग्य उत्पन्न कराके क्षपक के लिये कर्ण में जो जाप देते हैं, उसे कर्णजाप कहते हैं । अब वही कहते हैं -

  सदासुखदासजी