
णिस्सल्लो कदसुद्धी विज्जावच्चकरवसधिसंथारं ।
उवधिं च सोधइत्ता सल्लेहण भो कुण इदाणिं॥727॥
वैयावृतकारक, संस्तर अरु उपधि वसति का शोधन कर ।
हो निःशल्य रत्नत्रय निर्मल धार क्षपक सल्लेखन कर॥727॥
अन्वयार्थ : भो मुने! अब तत्त्वों का श्रद्धान करके, सरलता से भोगों में नि:स्पृहतापूर्वक मिथ्या, माया, निदान शल्यरहित होओ और रत्नत्रय की शुद्धता से कृतशुद्धि होओ । नि:शल्य और कृतशुद्धि होकर वैयावृत्त्य करनेवालों को तथा वसतिका एवं उपकरणों को शोधकर सल्लेखना करना ।
सदासुखदासजी