
मिच्छत्तस्स य वमणं सम्मत्ते भावणा परा भत्ती ।
भावणमोक्काररदिं णाणुवजुत्ता सदा कुणदु॥728॥
मिथ्यादर्शन त्यागो, समकित भाओ, उत्तम भक्ति करो ।
भाव नमन में लीन रहो अरु ज्ञान भावना युक्त रहो॥728॥
अन्वयार्थ : भो मुने! मिथ्यात्व का वमन करो और सम्यक्त्व की बारम्बार भावना करो, पंच परमेष्ठी के गुणों में अनुराग रूप परम भक्ति करना, पंच परम गुरुओं को नमस्कार रूप भाव णमोकार में रति करना, 'नमस्तस्मै' इत्यादि शब्द का उच्चारण करना तथा मस्तक नमाना, अंजुली जोडकर खडे रहना द्रव्य नमस्कार है और पंच परम गुरुओं में अनुराग करके आत्मा की नम्रता भाव नमस्कार है । उसमें रति करना और ज्ञानोपयोग रूप निरन्तर प्रवृत्ति करना ।
सदासुखदासजी