
पंचमहव्वयरक्खा कोहचउक्कस्स णिग्गहं परमं ।
दुद्दंतिंदियविजयं दुविहतवे उज्जमं कुणदि॥729॥
पंच महाव्रत की रक्षा, क्रोधादि कषाय चार जीतो ।
दुर्दम इन्द्रिय को जीतो द्वय विधि तप में उद्योग करो॥729॥
अन्वयार्थ : भो मुने! पंच महाव्रत की रक्षा करना और क्रोध चतुष्क का परम निग्रह करो । दुर्दम इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करो तथा दो प्रकार के तपों में उद्यम करो ।
सदासुखदासजी