+ अब मिथ्यात्व का वमन ग्यारह गाथाओं में कहते हैं- -
संसारमूलहेदुं मिच्छत्तं सव्वधा विवज्जेहि ।
बुद्धिं गुणण्णिदं पि हु मिच्छत्तं मोहिदं कुणदि॥730॥
भवतरु का है मूल हेतु मिथ्यात्व सर्वथा वर्जन योग्य ।
गुण संयुत बुद्धि को भी मिथ्यादर्शन कर देता मूढ़॥730॥

  सदासुखदासजी